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एक आम आदमी ..........जिसकी कोशिश है कि ...इंसान बना जाए

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सोमवार, 21 मई 2012

मंत्री जी ध्यान दें ......



जैसा कि आप सब जानते हैं , कि एक आम आदमी की लडाई के रूप में मैंने ये मुहिम शुरू की हुई है और इसके तहत मैं , सरकार , प्रशासन , मंत्रियों , विभागों , अधिकारियों , सबको अलग अलग मुद्दों , समस्याओं , सुझावों से संबंधित पत्र लिखता हूं और उन्हें प्रेषित करता हूं । उन पत्रों की स्कैन प्रति यहां दो उद्देश्यों के लिए चस्पा की जाती हैं । पहला तो ये कि सनद रहे कि एक पत्र यहां भी मौजूद है । दूसरा ये कि शायद ऐसी ही कोई चिट्ठी किसी मुझ जैसे आम आदमी को भी ऐसे किसी प्रयास के लिए प्रेरित कर सके क्योंकि एक से दो भले और दो से भले चार ....। आज मंत्री जी का ध्यान खींच रहा हूं , राजधानी दिल्ली में पेय जल के लिए प्याउ और प्रसाधन की घोर कमी की ओर ..हां यही है आज की चिट्ठी





शनिवार, 5 मई 2012

आज की चिट्ठी ......मंत्री जी ध्यान दें



जैसा कि आप जानते हैं कि , ये ब्लॉग उन चिट्ठियों का ई दस्तावेजीकरण है जिन्हें मैं समय समय पर सरकार , उनके प्रतिनिधि , विभिन्न संस्थानों , निकायों , अधिकारियों के नाम लिखता रहता हूं जो कि एक आम नागरिक के रूप में मेरा फ़र्ज़ है । स्थानीय समस्याओं से लेकर नागरिक जीवन के बहुत से मुद्दों पर सलाय और उपाय से लेकर कुछ भी और सब कुछ


आज की चिट्ठी , मुख्यमंत्री दिल्ली सरकार के नाम



मंगलवार, 11 अक्टूबर 2011

हाकिम झाडू उठाइए हो ....





जैसा कि आप जानते हैं कि पहले से ही सरकार के साथ अपनी चिट्ठी पत्री चलती रहती है अजी बात का क्या है ।  बस कभी आसपास की बातें तो कभी आमोखास की बातें, कुल मिलाकर बात ये है कि सरकार और हमारी दोस्ती धीरे धीरे पक्की होती जा रही है और हम उन्हें झंझोडने में लगे रहते हैं । हालांकि , पिछले दिनों खतों की रफ़्तार थोडी धीमी पडी ,लेकिन यकीन मानिए ,अभी कलम में स्याही बहुत है , बुलंदी बहुत है , तबाही बहुत है ...। किंतु पिछले कुछ दिनों में अपनी गली की एक समस्या को नासूर बनते हुए देख कर मन बागी हो उठा । हमने कार्यालय जाने से पहले दन्न से मोर्चा संभाला और सुपुत्र जी को स्कूल से वापस छोडते समय , फ़टाक से रपट तैयार कर दी । आसपास के लोगों से , संबंधित अधिकारियों एवं जनप्रतिनिधियों का पक्ष भी ले लिया गया । मोबाइल ने कैमरे का काम बहुत पहले ही बहुत आसान कर दिया , सो क्लिक , क्लिक ,क्लिक । मेल तैयार कर मीडिया मित्रों को प्रेषित कर दिया गया ।





















नई दुनिया एवं दैनिक जागरण ने न सिर्फ़ प्रमुखता से खबर छापी , बल्कि संबंधित जनप्रतिनिधियों से शिकायत के लिए किए जा रहे प्रयास की बाबत भी जानकारी मांग ली । अब इस खबर के प्रकाशित होने के बाद अस्थाई व्यवस्था / उपाय का कार्य शुरू हो चुका है , कैसा और क्या , ये बताता हूं अगली पोस्ट में ।



बुधवार, 13 जुलाई 2011

एक चिट्ठी सब मां बाप के नाम








आज किसी सरकार और किसी मंत्री के नाम मैं कोई चिट्ठी नहीं लिखने जा रहा हूं , उनसे तो शिकायत का सिलसिला चलता ही रहेगा , लेकिन इधर कुछ दिनों में अपने कार्यालीय और निजि अनुभव से कुछ तल्ख सा महसूस किया और शायद उसे लेकर बहुत असहज भी रहता हूं । ये सच है कि आज जमाना रफ़्तार का है , सब कुछ रफ़्तारमय है , रिश्ते , नाते , उम्र , बचपन से जवानी तक का सफ़र , और जवानी क्या जिंदगी  से मौत का सफ़र भी .सब कुछ रफ़्तारमय हो गया है । खैर मेरा मकसद आज कुछ कुछ इसी से जुडा है । ये चिट्ठी आज देश के तमाम मां बाप के नाम लिख रहा हूं , नहीं नहीं , कोई लंबा चौडा भाषण नहीं , नहीं जी कोई वादा भी नहीं , न बाबा बहुत खर्चीला और बहुत कठिन भी नहीं है देखा जाए तो ।

देश के सारे मम्मी डैडियों ,

सादर अभिवादन । आपके बच्चे खूब फ़लें फ़ूलें , और इस देश का ऐसा सुनहरा भविष्य बनें और सच कहा जाए तो मां बाप के रूप में आप सबकी कडी मेहनत को देखते हुए इसमें मुझे कोई संदेह भी नहीं । लेकिन पिछले कुछ समय में मैंने देखा और पाया है कि ,गलियों से लेकर सडकों तक , दुपहिए और चारपहिए तक लिए हुए बहुत कम उम्र के बच्चे , जी हां आपके और हमारे घरों के बच्चे ही , बहुत ही तेज़ रफ़्तार से जाने कौन सी दौड लगा रहे हैं । मुझे लगता है कि चलो कुछ दिन भागदौड कर शायद थकहार कर रफ़्तार थोडी कम हो जाएगी , लेकिन अफ़सोस कि वो तो दिनों दिन बढती ही जा रही है । वे एक दूसरे से टकराते हैं , बहुत बार इतजी ज़ोर से से कि उनमें से एक जाने कहां और किस रास्ते चला जाता है । घर इंतज़ार करते रह जाते हैं ।


तो मेरी गुजारिश , आप सब मम्मी पापाओं से सिर्फ़ इतनी है कि अपने बच्चों को तब तक , सिर्फ़ तब तक बाईक , सकूटर ,स्कूटी और कार चलाने के लिए मत दीजीए ,क्योंकि ,एक उम्र तक बच्चे सायकल चलाते ही अच्छे लगते हैं । मैं मानता हूं कि , मोबाईल , नेट जैसे साधन अब जरूरत का रूप ले चुके हैं और ऐसा ही शायद आपको अपनी बाईक , या स्कूटर से जाने वाले अपने बच्चों की जरूरत लगती हो , लेकिन इसके बावजूद भी सिर्फ़ ये ध्यान रखिए कि , चाहे थोडी देर के लिए ही रफ़्तार की चाभी अपने उस बच्चे के हाथ थमा कर आप कितना बडा खतरा बना देते हैं । वो एक आत्मघाती बम के समान ही होता है । सबसे बडी त्रासदी ये है कि ऐसी दुर्घटनाओं में एक आखिरी सहारे के रूप में मिलने वाला दुर्घटना मुआवजा तक नहीं मिल पाता है ।

आप इस बात की गंभीरता को समझिए ,क्योंकि घर के चिराग अब बहुत जल्दी जल्दी बुझने लगे हैं , यदि रफ़्तार यही रही तो फ़िर पूरी बस्ती में अंधेरा ही रहेगा बस । उम्मीद है कि , आप अपने बच्चों को खुद बुलाई जाने वाली इस मौत से बचाने की पूरी कोशिश करेंगे ।